यूपी में सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने पर FIR? कई जिलों में कार्रवाई के बाद उठे बड़े सवाल
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की हालत को लेकर सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया है। कई जिलों में स्कूलों की स्थिति दिखाने वाले पत्रकारों, सोशल मीडिया यूजर्स और आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़े नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की खबर सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, देवरिया के बाद कम से कम आठ अन्य जिलों—गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, हरदोई, हाथरस, मेरठ, लखनऊ, अमेठी और सिद्धार्थनगर—में भी ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं।
मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि एक तरफ प्रशासन इन वीडियो को भ्रामक और बिना अनुमति बनाए गए वीडियो बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ पत्रकारों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि वे केवल सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत जनता के सामने रख रहे थे।
आखिर पूरा मामला क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार, विवाद की शुरुआत देवरिया से हुई, जहां एक युवक ने सरकारी स्कूल की खराब स्थिति का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया था। इसके बाद ऐसे ही वीडियो और मामलों को लेकर प्रदेश के दूसरे जिलों में भी पुलिस कार्रवाई की जानकारी सामने आई।
मामले ने उस समय ज्यादा तूल पकड़ा जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से अधिकारियों को सरकारी स्कूलों से जुड़े “फर्जी” और “भ्रामक” वीडियो के जरिए माहौल खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई। इसके बाद कई जिलों में FIR दर्ज होने की खबर सामने आई।
सिद्धार्थनगर में AAP नेता पर FIR
सिद्धार्थनगर में AAP के प्रदेश अध्यक्ष इमरान लतीफ के खिलाफ FIR दर्ज होने की रिपोर्ट है। आरोप है कि उन्होंने स्कूल परिसर में जाकर वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया।
लतीफ का कहना है कि उन्होंने छुट्टी के दिन स्कूल जाकर वहां की स्थिति का वीडियो बनाया था। उनके मुताबिक स्कूल का गेट टूटा हुआ था और कक्षाओं से जुड़ी कई समस्याएं दिखाई दे रही थीं।
वहीं शिक्षा विभाग की शिकायत में वीडियो को भ्रामक और fabricated बताते हुए आरोप लगाया गया कि बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश कर वीडियो बनाया गया और विभाग की छवि खराब करने की कोशिश की गई।
गाजियाबाद में भी सामने आया मामला
गाजियाबाद में AAP नेता चंद्रमोहन चौहान के खिलाफ भी FIR दर्ज किए जाने की रिपोर्ट है। उन्होंने एक ऐसे स्कूल भवन का वीडियो बनाया था जिसे अधिकारियों के अनुसार पहले ही जर्जर घोषित किया जा चुका था और वहां नियमित कक्षाएं नहीं चल रही थीं।
वीडियो में पुराने भवन के आसपास कचरा और शराब की खाली बोतलें दिखाई गईं। शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूल को दूसरे भवन में मर्ज किया जा चुका है और वीडियो में पूरी स्थिति नहीं दिखाई गई।
वहीं AAP सांसद संजय सिंह ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति दिखाने पर FIR की जा रही है।
सिर्फ एक-दो जिले नहीं, कई जगह FIR
रिपोर्टों के अनुसार, मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है। कम से कम आठ जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जबकि कुछ अन्य जिलों में शिक्षा विभाग ने बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया यूजर्स को बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश करके फोटो या वीडियो बनाने से रोकने के निर्देश भी जारी किए हैं।
इसका मतलब यह है कि अब सरकार और शिक्षा विभाग सरकारी स्कूलों की तस्वीरें या वीडियो बनाने को लेकर ज्यादा सख्त रुख अपना रहे हैं।
प्रशासन का अपना पक्ष भी समझना जरूरी
इस मामले में केवल एक पक्ष को देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
शिक्षा विभाग और स्कूल प्रशासन का कहना है कि कुछ लोगों ने बिना अनुमति स्कूलों में प्रवेश किया, शिक्षकों से बहस की या वीडियो को संदर्भ से हटाकर पेश किया। कुछ मामलों में अधिकारियों ने यह भी कहा है कि वीडियो में दिखाए गए पुराने या बंद भवन को चालू स्कूल के रूप में दिखाया गया।
मसलन, हाथरस के एक मामले में शिक्षा अधिकारी ने बताया कि वीडियो में दिखाई गई पुरानी इमारत का हिस्सा हाईवे निर्माण के दौरान प्रभावित हुआ था और स्कूल की कक्षाएं दूसरे हिस्से में चल रही थीं।
यानी हर वीडियो में दिखाई गई तस्वीर को देखकर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं होगा कि पूरा सरकारी स्कूल उसी हालत में चल रहा है।
लेकिन बड़ा सवाल भी यहीं से उठता है…
अगर किसी सरकारी स्कूल में वास्तव में टूटी दीवार, खराब शौचालय, पानी की समस्या, जर्जर भवन या दूसरी बुनियादी दिक्कतें हैं, तो उन्हें ठीक कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
और अगर कोई व्यक्ति ऐसी समस्या को रिकॉर्ड करके सामने लाता है, तो क्या पहले उस समस्या की जांच और समाधान होना चाहिए या सीधे FIR?
दूसरी तरफ, अगर कोई व्यक्ति बिना अनुमति स्कूल में घुसता है, शिक्षकों को परेशान करता है या जानबूझकर गलत जानकारी फैलाता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सवाल भी अलग है।
यही वजह है कि इस पूरे विवाद में सच्चाई की स्वतंत्र जांच और हर मामले के तथ्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
पत्रकारिता और सरकारी स्कूल—दोनों के लिए जरूरी है पारदर्शिता
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे देश के सबसे बड़े हिस्से से आते हैं। इसलिए स्कूलों की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाना भी जरूरी है और गलत जानकारी फैलने से रोकना भी।
अगर किसी स्कूल की हालत खराब है तो प्रशासन को उसे सुधारना चाहिए। और अगर किसी वीडियो में गलत जानकारी है तो प्रशासन को तथ्यों और दस्तावेजों के साथ उसका जवाब देना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल
क्या सरकारी स्कूलों की कमियां दिखाने वाले हर व्यक्ति को रोकना समाधान है, या फिर सही तरीके से जांच कर समस्या को ठीक करना ज्यादा जरूरी है?
और साथ ही—
क्या स्कूल परिसर में बिना अनुमति वीडियो बनाने वालों के लिए कार्रवाई जरूरी है?
इस पूरे मामले में अंतिम तस्वीर जांच और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही साफ होगी।
Deshhit Bharat | हर पल देश के साथ 🇮🇳
नोट: इस रिपोर्ट में FIR में लगाए गए आरोपों और संबंधित पक्षों के दावों को आरोप/दावे के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। किसी FIR का दर्ज होना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता।
स्रोत: The Wire, Times of India और उत्तर प्रदेश पुलिस के सार्वजनिक रिकॉर्ड/वेबसाइट।