भारत में बिकने वाले पैकेज्ड फूड पर बड़ा सवाल: एक ही ब्रांड, लेकिन अलग देशों में अलग मानक क्यों?

नई दिल्ली: भारत में बिकने वाले पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सवाल सिर्फ लेबलिंग का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या बड़ी खाद्य कंपनियां भारत और दूसरे देशों में एक ही उत्पाद के लिए अलग-अलग पोषण मानक अपना रही हैं?
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब महाराष्ट्र के फूड कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने बड़ी खाद्य कंपनियों से सिर्फ कानूनी नियमों का पालन करने के बजाय उपभोक्ताओं के प्रति नैतिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंढे ने सवाल उठाया कि अगर कंपनियां अलग-अलग देशों में अलग पोषण मानक अपनाती हैं, तो इसके पीछे नैतिक आधार क्या है?
एक ही ब्रांड, लेकिन कैलोरी और चीनी में बड़ा अंतर
Reuters की रिपोर्ट में Fanta का उदाहरण दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, लंदन में बिकने वाली एक कैन में करीब 63 कैलोरी बताई गई, जबकि समान आकार के भारत में बिकने वाले उत्पाद में करीब 185 कैलोरी और लगभग तीन गुना ज्यादा चीनी होने की बात सामने आई।
हालांकि कंपनियां अलग-अलग देशों में स्थानीय नियमों, उपभोक्ताओं की पसंद और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार अपने उत्पादों की रेसिपी बदल सकती हैं। लेकिन अब बहस इस बात पर है कि क्या सिर्फ कानूनी रूप से अनुमत होना ही पर्याप्त है, या कंपनियों को उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के प्रति इससे आगे जाकर जिम्मेदारी निभानी चाहिए?
चेतावनी वाले लेबल को लेकर भी विवाद
पैकेज्ड फूड पर सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी वाले लेबल यानी Front-of-Pack Warning Labels का मुद्दा भी इस बहस के केंद्र में है।
Reuters के मुताबिक, भारत में ऐसे लेबल लागू करने की योजना को लेकर खाद्य कंपनियों और उद्योग संगठनों की ओर से आपत्तियां उठाई गई थीं। वहीं, तुकाराम मुंढे ने चेतावनी वाले लेबल का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसे लेबल उपभोक्ता की समझ का अपमान नहीं करते, बल्कि उसे बेहतर जानकारी देकर निर्णय लेने का अधिकार देते हैं।
उनका तर्क है कि लोगों को किसी बीमारी के बाद डॉक्टर से यह बताने का इंतजार नहीं करना चाहिए कि उन्हें किन चीजों से बचना है। बेहतर होगा कि उत्पाद खरीदते समय ही उपभोक्ता को उसकी पोषण संबंधी जानकारी साफ तौर पर दिखाई दे।
सुप्रीम कोर्ट भी उठा चुका है सवाल
Front-of-Pack Labelling को लेकर मामला सिर्फ सरकार और कंपनियों के बीच बहस तक सीमित नहीं है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने भी पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग में देरी पर सवाल उठाते हुए इसके जल्द क्रियान्वयन की बात कही है।
वहीं, Nestlé के वैश्विक CEO ने भी कहा है कि भारत को खाद्य और पेय पदार्थों पर स्वास्थ्य संबंधी लेबलिंग के नियम तैयार करते समय निर्माताओं से सलाह लेनी चाहिए और पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक आधार पर होनी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल: भारतीय उपभोक्ता को क्या मिल रहा है?
भारत का पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार बेहद बड़ा है। ऐसे में अगर एक ही ब्रांड के उत्पाद अलग-अलग देशों में अलग मात्रा में चीनी, कैलोरी या अन्य ingredients के साथ बेचे जाते हैं, तो उपभोक्ताओं के सामने यह सवाल स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि उन्हें अपने स्वास्थ्य से जुड़ी पूरी और स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
मामला केवल किसी एक कंपनी या एक उत्पाद का नहीं है। असली सवाल Consumer Right और Transparency का है।
क्या कंपनियों को भारत में भी वही पोषण संबंधी मानक अपनाने चाहिए जो वे दूसरे विकसित बाजारों में अपनाती हैं?
या फिर अलग-अलग देशों के नियम और बाजार की परिस्थितियां अलग होने के कारण उत्पादों में अंतर होना स्वाभाविक है?
आपकी राय क्या है? क्या पैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और फैट की मात्रा को लेकर सामने से स्पष्ट Warning Label अनिवार्य होना चाहिए?
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