Swiggy और Zomato के खिलाफ बेंगलुरु के रेस्टोरेंट्स की नाराजगी, 1 सितंबर तक टला फैसला।
अगर आप ऑनलाइन खाना ऑर्डर करने के लिए Swiggy या Zomato का इस्तेमाल करते हैं, तो बेंगलुरु से सामने आया यह मामला आपके लिए भी अहम है। शहर के होटल और रेस्टोरेंट मालिकों ने इन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ विरोध का ऐलान किया था। मामला इतना बढ़ गया था कि 15 अगस्त से बड़ी संख्या में रेस्टोरेंट्स के इन प्लेटफॉर्म्स से हटने की संभावना जताई गई थी।
रेस्टोरेंट एसोसिएशनों की शिकायत थी कि कमीशन, डिस्काउंट, प्रमोशनल कैंपेन और अलग-अलग तरह की कटौतियों की वजह से उनके मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि, अब इस विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। बातचीत के बाद बेंगलुरु के होटलियर्स ने Swiggy से अलग होने की कार्रवाई को 1 सितंबर तक टाल दिया है। Swiggy ने कथित तौर पर बिना रेस्टोरेंट की मंजूरी के लगाए गए कुछ प्रमोशनल कैंपेन शुल्क वापस करने पर सहमति जताई है।
15 अगस्त को क्या होने वाला था?
जुलाई के आखिर में बेंगलुरु के होटल और रेस्टोरेंट संगठनों ने Swiggy और Zomato के साथ अपने कारोबारी संबंधों को लेकर कड़ा रुख अपनाया था।
रेस्टोरेंट मालिकों का कहना था कि अगर उनकी मांगों पर तय समय में कार्रवाई नहीं होती है, तो वे 15 अगस्त के बाद इन प्लेटफॉर्म्स से अपने रेस्टोरेंट हटाने पर विचार करेंगे।
उस समय 1,000 से अधिक होटल और रेस्टोरेंट मालिकों के इस विरोध से ऑनलाइन फूड डिलीवरी बाजार में हलचल बढ़ गई थी।
लेकिन अब स्थिति पहले जैसी नहीं है। Swiggy के साथ बातचीत के बाद तत्काल टकराव को टाल दिया गया है और रेस्टोरेंट संगठनों ने कंपनी को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अगस्त के अंत तक का समय दिया है।
रेस्टोरेंट मालिक Swiggy और Zomato से नाराज क्यों हैं?
इस पूरे विवाद की जड़ सिर्फ कमीशन नहीं है। रेस्टोरेंट संगठनों ने कई मुद्दे उठाए हैं।
1. कमीशन और अन्य शुल्क
रेस्टोरेंट मालिकों का आरोप है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक्री होने के बावजूद विभिन्न शुल्क और कमीशन उनकी वास्तविक कमाई को काफी प्रभावित करते हैं।
उनका तर्क है कि रेस्टोरेंट को पहले से ही किराया, कर्मचारियों की सैलरी, कच्चा माल, बिजली और दूसरे खर्च उठाने पड़ते हैं। ऐसे में प्लेटफॉर्म से जुड़े अतिरिक्त खर्च मुनाफे को और कम कर देते हैं।
2. बिना सहमति डिस्काउंट का मुद्दा
रेस्टोरेंट मालिकों की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक प्लेटफॉर्म पर चलने वाले डिस्काउंट और प्रमोशनल ऑफर हैं।
उनका कहना है कि ग्राहक को आकर्षित करने के लिए कीमत कम करने से बिक्री बढ़ सकती है, लेकिन अगर इसका आर्थिक बोझ रेस्टोरेंट पर पड़ता है और उसे पहले से स्पष्ट जानकारी या सहमति नहीं मिलती, तो कारोबार का मॉडल मुश्किल हो जाता है।
रेस्टोरेंट एसोसिएशनों ने प्लेटफॉर्म्स से मांग की है कि डिस्काउंट और प्रमोशनल गतिविधियों में ज्यादा पारदर्शिता हो।
3. पेमेंट में कटौती और सेटलमेंट की पारदर्शिता
रेस्टोरेंट मालिकों ने अलग-अलग तरह की कटौतियों का स्पष्ट हिसाब उपलब्ध कराने की मांग की है।
उनकी मांग है कि हर ऑर्डर के बाद रेस्टोरेंट को यह साफ दिखाई दे कि ग्राहक से कितनी राशि ली गई, कौन-कौन से शुल्क काटे गए और अंत में रेस्टोरेंट को कितना भुगतान मिला।
4. कैंसिल ऑर्डर का नुकसान
एक अन्य मुद्दा उस स्थिति से जुड़ा है जब रेस्टोरेंट खाना तैयार कर चुका हो लेकिन ग्राहक का ऑर्डर कैंसिल हो जाए।
रेस्टोरेंट संगठनों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में पूरा नुकसान सिर्फ रेस्टोरेंट पर नहीं डाला जाना चाहिए।
Swiggy ने अब क्या कदम उठाया है?
अगस्त की शुरुआत में बातचीत तेज हुई और Swiggy के वरिष्ठ अधिकारियों की रेस्टोरेंट प्रतिनिधियों के साथ बैठक की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी बातचीत के बाद विवाद को तत्काल टकराव में बदलने से रोकने की कोशिश हुई।
सबसे अहम बात यह है कि Swiggy ने कथित तौर पर ऐसे प्रमोशनल कैंपेन के शुल्क वापस करने पर सहमति जताई है, जिन्हें रेस्टोरेंट्स की अनुमति के बिना चलाया गया था।
इसके साथ ही कंपनी ने बाकी मांगों पर काम करने के लिए अगस्त के अंत तक का समय मांगा है। इसी वजह से बेंगलुरु के होटलियर्स ने 15 अगस्त की जगह 1 सितंबर को अगली कार्रवाई की तारीख तय की है।
क्या 1 सितंबर से Swiggy-Zomato का Boycott होगा?
फिलहाल इसे पक्का फैसला कहना जल्दबाजी होगी।
असल में रेस्टोरेंट संगठनों ने कार्रवाई को टालकर बातचीत के लिए समय दिया है। इसका मतलब है कि आने वाले हफ्तों में अगर उनकी प्रमुख मांगों पर समाधान निकलता है, तो बहिष्कार टल भी सकता है।
लेकिन अगर बातचीत से संतोषजनक नतीजा नहीं निकलता, तो 1 सितंबर के आसपास एक बार फिर Swiggy और रेस्टोरेंट संगठनों के बीच टकराव सामने आ सकता है।
यानी फिलहाल 15 अगस्त की डेडलाइन हट गई है, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ है।
क्या Zomato पर भी पड़ेगा असर?
शुरुआत में विरोध Swiggy और Zomato दोनों को लेकर था। रेस्टोरेंट संगठनों ने दोनों प्लेटफॉर्म्स की कमीशन व्यवस्था, डिस्काउंट और दूसरी कटौतियों को लेकर चिंता जताई थी।
हालांकि, हालिया घटनाक्रम में Swiggy के साथ बातचीत और 1 सितंबर की नई समयसीमा ज्यादा प्रमुखता से सामने आई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि Zomato से जुड़े सभी मुद्दे खत्म हो गए हैं। बल्कि यह पूरा विवाद ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म और रेस्टोरेंट पार्टनर्स के बीच कारोबारी शर्तों को लेकर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है।
ग्राहकों पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर बड़ी संख्या में रेस्टोरेंट वास्तव में प्लेटफॉर्म से हटते हैं, तो सबसे सीधा असर ग्राहकों पर पड़ सकता है।
बेंगलुरु में कुछ लोकप्रिय रेस्टोरेंट Swiggy या Zomato पर उपलब्ध नहीं रह सकते हैं। ऐसे में ग्राहकों को सीधे रेस्टोरेंट की वेबसाइट, फोन या दूसरे ऑर्डरिंग माध्यमों से खाना मंगाने का विकल्प तलाशना पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, अगर रेस्टोरेंट और प्लेटफॉर्म के बीच समझौता हो जाता है, तो ग्राहकों के लिए मौजूदा व्यवस्था जारी रह सकती है।
एक और बड़ा सवाल डिस्काउंट का है। अगर रेस्टोरेंट्स प्लेटफॉर्म से मिलने वाले प्रमोशनल ऑफर कम करते हैं, तो आने वाले समय में ग्राहकों को कुछ ऑर्डर्स पर पहले की तुलना में कम छूट मिल सकती है।
क्या इस विवाद से फूड डिलीवरी का बिजनेस मॉडल बदल सकता है?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म ने रेस्टोरेंट और ग्राहक के बीच दूरी कम कर दी है। रेस्टोरेंट को डिजिटल ग्राहक मिलते हैं और ग्राहक को एक ही ऐप पर हजारों विकल्प।
लेकिन इस सुविधा के साथ एक लागत भी जुड़ी है।
अगर रेस्टोरेंट मालिकों को लगता है कि प्लेटफॉर्म पर बिक्री बढ़ने के बावजूद उनकी कमाई पर्याप्त नहीं बच रही, तो वे सीधे ऑर्डर लेने, अपनी वेबसाइट बनाने या दूसरे डिलीवरी विकल्पों की ओर बढ़ सकते हैं।
इससे भविष्य में फूड डिलीवरी इंडस्ट्री में कमिशन, डिस्काउंट और पार्टनरशिप मॉडल को लेकर नई बातचीत शुरू हो सकती है।
रेस्टोरेंट और फूड ऐप्स के बीच असली लड़ाई क्या है?
ऊपरी तौर पर यह विवाद कमीशन और डिस्काउंट का दिखाई देता है, लेकिन असली सवाल है—प्लेटफॉर्म और रेस्टोरेंट के बीच कारोबारी नियंत्रण कितना होना चाहिए?
रेस्टोरेंट चाहता है कि उसे अपनी कीमत, डिस्काउंट और प्रमोशन पर ज्यादा नियंत्रण मिले।
प्लेटफॉर्म चाहता है कि ग्राहक को आकर्षक कीमत और ज्यादा विकल्प मिलें, ताकि ऑर्डर बढ़ें।
ग्राहक चाहता है कि उसे अच्छा खाना, सही कीमत, तेज डिलीवरी और ज्यादा डिस्काउंट मिले।
यही तीनों हित जब एक-दूसरे से टकराते हैं, तो इस तरह के विवाद सामने आते हैं।
क्या बेंगलुरु का मामला दूसरे शहरों तक पहुंच सकता है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ऐसा जरूर होगा। लेकिन बेंगलुरु का विवाद यह जरूर दिखाता है कि रेस्टोरेंट और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म के बीच संबंध अब सिर्फ ऑर्डर और डिलीवरी तक सीमित नहीं हैं।
कमीशन, विज्ञापन, डिस्काउंट, पेमेंट सेटलमेंट और डेटा जैसे मुद्दे भी पार्टनरशिप के महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं।
अगर बेंगलुरु में रेस्टोरेंट संगठनों को अपनी प्रमुख मांगों पर समाधान मिलता है, तो यह मॉडल दूसरे शहरों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
Swiggy-Zomato Boycott: ग्राहकों के लिए अभी क्या जानना जरूरी है?
अभी ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है।
15 अगस्त से तत्काल बड़े पैमाने पर रेस्टोरेंट बंद होने की स्थिति फिलहाल टल गई है। बातचीत के लिए नई समयसीमा तय हुई है और 1 सितंबर 2026 अगली महत्वपूर्ण तारीख बन गई है।
इसलिए अगर आप बेंगलुरु में Swiggy या Zomato से खाना ऑर्डर करते हैं, तो आने वाले हफ्तों में अपने पसंदीदा रेस्टोरेंट की उपलब्धता पर नजर रखना बेहतर होगा।
Swiggy-Zomato Boycott पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Swiggy-Zomato Boycott क्यों हो रहा है?
बेंगलुरु के रेस्टोरेंट संगठनों ने कमीशन, डिस्काउंट, प्रमोशनल कैंपेन और विभिन्न तरह की पेमेंट कटौतियों को लेकर चिंता जताई है।
क्या 15 अगस्त 2026 से Swiggy और Zomato का Boycott होगा?
फिलहाल 15 अगस्त वाली कार्रवाई टल गई है। Swiggy से बातचीत के बाद रेस्टोरेंट संगठनों ने अगली समयसीमा 1 सितंबर 2026 रखी है।
Swiggy ने रेस्टोरेंट की कौन सी मांग मानी है?
रिपोर्टों के अनुसार, Swiggy ने बिना रेस्टोरेंट की अनुमति के चलाए गए कुछ प्रमोशनल कैंपेन से जुड़े शुल्क वापस करने पर सहमति जताई है।
क्या बेंगलुरु में Swiggy से खाना ऑर्डर करना बंद हो जाएगा?
अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता। फिलहाल रेस्टोरेंट संगठनों और Swiggy के बीच बातचीत जारी है और तत्काल बहिष्कार को टाल दिया गया है।
1 सितंबर 2026 क्यों महत्वपूर्ण है?
यह नई समयसीमा है, जिसके पहले Swiggy से बाकी मुद्दों के समाधान की उम्मीद की जा रही है। अगर समाधान नहीं निकलता, तो रेस्टोरेंट संगठन आगे की कार्रवाई पर फैसला ले सकते हैं।
निष्कर्ष
बेंगलुरु का Swiggy-Zomato विवाद सिर्फ दो फूड डिलीवरी ऐप्स और कुछ रेस्टोरेंट मालिकों के बीच का मामला नहीं है। यह उस बिजनेस मॉडल पर सवाल उठाता है जिसमें ग्राहक को सुविधा देने के लिए रेस्टोरेंट और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
15 अगस्त की प्रस्तावित डेडलाइन अब टल चुकी है और 1 सितंबर नई महत्वपूर्ण तारीख बन गई है। आने वाले दिनों में बातचीत से समाधान निकलता है या रेस्टोरेंट फिर से बहिष्कार का रास्ता अपनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल इतना साफ है कि Swiggy-Zomato Boycott का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, बल्कि बातचीत के एक नए दौर में पहुंच गया है।