September 12, 2026

₹30 हजार, संक्रमित हाथ और एक युवा का जुनून: बिट्टू ने अजनार नदी की सफाई कर सिस्टम के सामने खड़े किए बड़े सवाल

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20 वर्षीय छात्र ने बिना सरकारी फंडिंग के शुरू किया अभियान; प्रदूषित पानी में उतरते-उतरते हाथ-पैर संक्रमित हुए, फिर भी नहीं रुका सफाई का मिशन

ब्यावरा/राजगढ़, मध्य प्रदेश:
जब नदियों की सफाई और पुनर्जीवन के लिए देशभर में करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बनाई जाती हैं, तब मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा से सामने आई एक कहानी सिस्टम, समाज और नागरिक जिम्मेदारी—तीनों पर सवाल खड़े करती है।

यह कहानी है 20 वर्षीय सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें सोशल मीडिया पर “बिट्टू तबाही” के नाम से जाना जाता है।

बिट्टू ने 26 जनवरी 2026 से ब्यावरा की प्रमुख अजनार नदी के प्रदूषित हिस्सों की सफाई का अभियान शुरू किया। राजगढ़ जिला प्रशासन की वेबसाइट भी अजनार को ब्यावरा शहर की प्रमुख नदी बताती है।

जब नदी नदी कम और कचरे का ढेर ज्यादा दिखने लगी

रिपोर्टों के अनुसार अजनार नदी के कई हिस्सों में प्लास्टिक, बोतलें, सड़ा हुआ कचरा, जलकुंभी और धार्मिक सामग्री जमा हो गई थी। कई जगहों पर पानी तक दिखाई देना मुश्किल था।

ऐसे में बिट्टू ने किसी बड़े संगठन, मशीन या सरकारी अभियान का इंतजार नहीं किया।

उन्होंने खुद नदी में उतरकर कचरा निकालना शुरू कर दिया। शुरुआत में कुछ दोस्त साथ आए, लेकिन बाद में अभियान की जिम्मेदारी काफी हद तक बिट्टू ने खुद संभाली।

न मशीन, न फंडिंग—फिर भी शुरू कर दिया काम

बिट्टू एक B.Sc. छात्र हैं। रिपोर्टों के अनुसार सफाई अभियान के लिए उन्होंने और शुरुआती सहयोगियों ने बुनियादी उपकरण और डस्टबिन जुटाए। इस अभियान पर लगभग ₹30,000 खर्च होने की बात सामने आई है।

उन्होंने नदी के आसपास डस्टबिन भी लगाए और धार्मिक सामग्री सहित कुछ जैविक कचरे को खाद में बदलने की कोशिश की, ताकि वही कचरा दोबारा नदी में न पहुंचे।

लेकिन इस काम की कीमत सिर्फ पैसे से नहीं चुकानी पड़ी।

नदी साफ करते-करते संक्रमित हो गए हाथ-पैर

लगातार प्रदूषित पानी और कचरे के संपर्क में रहने के कारण बिट्टू को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हुईं।

Indian Express को दिए एक इंटरव्यू में बिट्टू ने बताया था कि उनके हाथ संक्रमित हो गए थे और हाथों-पैरों की त्वचा तक प्रभावित हुई। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके पास नदी सफाई के लिए मशीन बनाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने हाथों से जितना संभव हुआ, सफाई की।

यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एक युवक ने नदी की सफाई की।

सवाल यह भी है कि—

क्या किसी सार्वजनिक जलस्रोत की सफाई के लिए एक 20 वर्षीय छात्र को अपनी सेहत जोखिम में डालनी चाहिए?

लोगों ने कहा—“पागल है”, कुछ ने बताया लाइक्स का स्टंट

बिट्टू के सफाई अभियान को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए।

कुछ लोगों ने उन्हें “पागल” कहा, तो कुछ ने आरोप लगाया कि वह सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए यह काम कर रहे हैं।

लेकिन बिट्टू का जवाब उनकी मेहनत में दिखाई देता है।

रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने वीडियो में बताया कि सफाई का काम केवल कंटेंट बनाने तक सीमित नहीं था और नदी के एक हिस्से या घाट को साफ करने में कई महीने लग सकते हैं।

आज उनके Before और After वीडियो और तस्वीरें लाखों लोगों तक पहुंच चुकी हैं।

सरकारों पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन तुलना भी सही होनी चाहिए

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

भारत में बड़ी नदी पुनर्जीवन परियोजनाएं केवल कचरा उठाने तक सीमित नहीं होतीं। इनमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, सीवरेज नेटवर्क, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, ठोस कचरा प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और अन्य बुनियादी ढांचा शामिल होता है।

उदाहरण के तौर पर, केंद्र सरकार के अनुसार नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत जून 2014 से मार्च 2026 तक विभिन्न एजेंसियों को ₹21,340 करोड़ वितरित किए गए हैं। इसलिए किसी राष्ट्रीय नदी परियोजना के बजट की सीधी तुलना बिट्टू के ₹30,000 के स्थानीय सफाई अभियान से करना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।

लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खत्म नहीं होता।

सवाल यह है—

क्या स्थानीय स्तर पर छोटी नदियों और जलस्रोतों की नियमित सफाई के लिए प्रशासन के पास कोई प्रभावी व्यवस्था है?

अगर एक नदी कचरे के ढेर में बदलती रही, तो जिम्मेदारी किसकी है?

और सबसे बड़ा सवाल—

एक 20 साल के छात्र को नदी में उतरकर वह काम क्यों करना पड़ा, जिसे रोकने और संभालने की जिम्मेदारी स्थानीय व्यवस्था की भी है?

बिट्टू ने सिर्फ नदी नहीं साफ की, हमारी सोच भी साफ की है

बिट्टू की कहानी को केवल “एक वायरल हीरो की कहानी” मानना गलत होगा।

यह कहानी हमें तीन बातें सिखाती है—

1. समस्या सरकार की हो सकती है, जिम्मेदारी समाज की भी होती है

नदी में कचरा फेंकने वाले भी हम हैं।

2. नागरिक पहल बदलाव की शुरुआत कर सकती है

एक व्यक्ति पूरे सिस्टम का विकल्प नहीं हो सकता, लेकिन बदलाव की शुरुआत जरूर कर सकता है।

3. प्रशासन और नागरिकों को साथ आना होगा

बिट्टू जैसे युवाओं को अकेले और असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के बजाय स्थानीय प्रशासन, नगर निकाय और पर्यावरण विभाग का सहयोग मिलना चाहिए।

₹30,000 से ज्यादा की कहानी

बिट्टू की कहानी का सबसे बड़ा संदेश शायद ₹30,000 नहीं है।

असल संदेश है—

एक व्यक्ति ने इंतजार करना बंद कर दिया।

न मशीन थी।
न बड़ी टीम थी।
न सरकारी फंडिंग थी।
न पर्याप्त सुरक्षा उपकरण।

फिर भी उसने शुरुआत की।

और शायद यही वजह है कि आज अजनार नदी की कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय है।

अब सवाल बिट्टू से नहीं, हमसे है—

हम अपने शहर, अपनी नदी और अपने आसपास की गंदगी के लिए किसका इंतजार कर रहे हैं?


EDITOR’S NOTE

बिट्टू के प्रयास की सराहना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी नागरिक को बिना सुरक्षा उपकरणों के प्रदूषित पानी में उतरने के लिए प्रोत्साहित न किया जाए। नदी सफाई और प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक योजना, कचरा प्रबंधन, सुरक्षा उपकरण और स्थानीय प्रशासन का सहयोग आवश्यक है।


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